रविवार, 6 सितंबर 2009

आशाओं का द्वीप

मुम्बई 1 सितम्बर 2009
याह्या खां. नाम सुनते ही हमें याद आता है पाकिस्तान का तानाशाह जिसने पूर्वी पाकिस्तान में अत्याचार किये और जो बंग्लादेश के जन्म का कारण बना. लेकिन आज हम उस याह्या खां की बात नहीं कर रहे.
मुम्बई हवाई अड्डे पर उतर कर टैक्सी के लिये बाहर आया तो पच्चीस छ्ब्बीस साल का एक ड्राईवर मेरी ओर लपका और मेरा सामान थाम लिया. मैं उसकी टैक्सी में बैठा और चल दिया.
मैंने उसका नाम पूछा,
याह्या खां, सर !
वह अधिकतर टैक्सी ड्राईवरस् की तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश का है. इलाहाबाद के पास का. दस साल से यहाँ रहता है.
कौन कौन रहता है यहाँ ?
अकेला रहता हूँ, सर. बाकी सब लोग गाँव में रहते हैं.
कौन कौन है घर में ?
दादी हैं, माँ हैं, एक छोटा भाई और दो छोटी बहन हैं.
पिछ्ले साल याह्या के पिता का इंतकाल हो गया. तब तक वो और उसके पिता दोनो मुम्बई में रहते थे. लेकिन अब वो अकेला रह गया. दादा को तो उसने देखा भी नहीं था. पिता भी पूरे घर की जिम्मेदारी उस पर छोड कर चल दिये.
भाई बहन गाँव में पढते हैं. याह्या हाईस्कूल तक पढा और फिर मुम्बई आ गया. सभी तो उसके गाँव से यहीँ आते हैँ.
अकेला है तो क्या हुआ, वो पूरी शिद्द्त से पूरे रोजे रखता है. अभी अभी इफ्तार के बाद टैक्सी लेकर आया है. वो रात भर टैक्सी चलायेगा. उसे इसका तीन सौ रुपया किराया देना होता है. याह्या दिन में एक मेडीकल स्टोर पर भी काम करता है.
अरे भैया! सोते कब हो ?
बस, सवारी का इंतजार करते करते सो लेता हूँ, सर !
याह्या ! रमजान पर घर नहीं गये? ईद पर जाओगे ?
नहीं सर ! दिसम्बर में जाऊँगा.
अभी क्यों नहीं. इतना बडा त्योहार है. घर पर सब तुम्हारा इंतजार करेंगे.
पर सर, मुझे पैसा इकठ्ठा करना है, बहन की शादी करनी है. ईद पर सब घर जाते हैं, टैक्सी की बडी किल्लत रहती है. ऐसे में आमदनी अच्छी हो जाती है. इसलिये मैं घर नहीं जाउंगा.
आजकल मुम्बई में गणेश उत्सव और रमजान की धूम है. हर मोड पर होर्डिंग से तरह तरह के नेता जनता को शुभेच्छा देते झाँक रहे हैं.
आजकल मुम्बई में बडी रौनक है. कैसा लगता है?
अच्छा तो लगता है सर ! पर अपने इलाहाबाद बाली बात नहीं है. सिविल लाईंस का दशहरा कितना सुंदर रहता है. वैसे एक बात कहूँ सर, मुझे हिन्दुओं के त्योहारों में रक्षाबंधन सबसे अच्छा लगता है. कितना प्यारा त्योहार है. जब तक मैं गाँव में था , बहनों से राखी बंधाता था.
गणेश पंडालों के बाहर भीड है, जगह जगह जाम लगे हैं. पर गंत्व्य आ गया.
बाहर बारिश हो रही है पर मुझे भिगो रही हैं याह्या की गीली आँखे.

8 टिप्‍पणियां:

  1. Sharmaji ye aapke pravah me bar bar bahne ka man karta hai. sidhi sahaj bhasha me itane powerful expressions ! Full marks to you. Bas local train ki jgah Mubaiya taxi hoti to aur achcha hota

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  2. भाव से परिपुर्ण बहुत ही सुन्दर रचना। बधाई इस बेहतरिन लेख के लिए।

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  3. ऐसा विस्थापन स्थाई विस्थापन से अधिक दर्दनाक होता है।
    ....
    पेट ! क्या कहें?

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  4. पेट के लिए क्या क्या नहीं होता । अच्छे भाव ।

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  5. आपके यात्रा प्रवाह मे ऐसे बहे कि लगा जैसे हम भी साथ मे सफर कर रहे हों और साक्षात सब देख सुन रहे हों कथा शैली,कथ्य, कथान शिल्प सब कुछ लाजवाब बधाई

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  6. भाव से परिपुर्ण बहुत ही सुन्दर रचना।

    http://sanjay.bhaskar.blogspot.com

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