गुरुवार, 19 नवंबर 2009

नीबू का पेड


दिल्ली और यूपी भी 6 से 8 नवम्बर 09



बचपन में जब हम अपनी ननिहाल जाते थे तो बरहे ( खेत खनिहान ) में हमारा काफी समय नीबुओं के झुरमुट में बीतता था. वहाँ ठंडा तो रहता ही था, साथ में कच्चे कच्चे नीबू तोडकर, नमक लगा कर खाने में बहुत मजा आता था. याद तो हमें गन्ने के खेत भी आते हैं, हम गन्ने तो तोडकर खाते ही थे, साथ ही सरसों के पत्ते पर ताजा ताजा गुड भी हमें अच्छा लगता था. कपास के खेत भी भूला नहीं हूँ, हम कपास के फाहे इकठ्ठा करते थे जिनसे कभी गोबिन्दा की दुकान से चूरन या लेमनचूस खरीदते थे और कभी उसे घर पे देते थे जहाँ उसे कात कर धागा बना कर स्टेशन के पास विनोबा आश्रम भेज कर खादी के कपडे आते थे. अब न नीबू का वो झुरमुट रहा न कपास के खेत. कल तक हमारे गांव सेल्फ सस्टेंड समाज थे जहाँ अपनी आवश्यकता की वस्तुयें या तो स्वयम उगायी जाती थी या वस्तु विनमय से आती थी. हर कोई अपने खेतों में कुछ फल के पेड लगाते थे, एक खेत में सब्जी उगाते थे, एक में दाल, कहीं थोडी सी ईख लगाते थे और थोडी सी कपास भी. गेहूं के खेत में सरसों की पीली पीली कतार कितना सुंदर दृश्य प्रस्तुत करती थी. भूमंडलीकरण ने गांवो का यह रूप समाप्त कर दिया है.


आज अचानक गांव कैसे याद आया ? आज मैं दिल्ली या यूपी में हूँ ( जिस स्थान पर रुका हूँ वह आधा इधर आधा उधर है ) और मेरे होटल का नाम है, लेमन ट्री. इस नाम को देख मेरे मन में एक आलेख आया, अजब अजब नामों के बारे में. कुछ दिन पहले भी एक होटल में रुका था जिसका नाम था, जिंजर. अंग्रेजी मे व्यवसायिक नाम बडे रोचक होते हैं. एक प्रसिद्ध कम्प्यूटर कम्पनी है जिसका नाम है ऐपल. उधर एक जींस कम्पनी है, बफेलो. ये ही नाम यदि हिन्दी में हों तो, नीबू का पेड, अदरक, सेब, भैंस.


लेकिन, नीबू का पेड सोचते ही गांव याद आ गया. लेकिन गांव अब गांव कहाँ रहे. विकास के नाम पर उनका मनोहारी जीवन दायी रूप बिगड गया. आज गांव शहरों के बिगडे हुये छोटे भाई लगते हैं. कई सालों बाद अपने गांव गया तो मुझे लगा कि मैं कहाँ आ गया. सब कुछ बदला बदला सा. और ये बदलाव प्रगति वाला तो बिल्कुल नहीं था. पालायन की छाया स्पष्ट थी, हर कुछ घर के बाद घरों पर ताले जडे थे. कोई पहचाना चेहरा नजर नहीं आया जबकि पूर्व में कोई भी मिलता था तो पहचान ढूंढ ही लेता था.


लेमन ट्री से लौटा तो सोचा इस बार गांव जाउंगा तो नीबू का एक पेड अवश्य लगाउंगा.

चित्र : मेरे गांव का गूगल सेटलाईट चित्र.  गांव कितने सेल्फ सस्टेंड थे और ईको फ्रेंडली भी इसका उदाहरण उत्तर में बडा पोखर. ऐसे कई पोखर हैं गांव में, जिनमें एक का नाम है रावण वाला पोखरा क्योंकि वहाँ दशहरे का मेला लगता है. ये सब रेन वाटर हार्वेस्टिंग करते रहे हैं. लेकिन ये सब भी अब खत्म हो रहे हैं.   

14 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा संस्मरण रहा । बधाई

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  2. लेकिन गांव अभी भी शहरों से बेहतर हैं.

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  3. मुकुटधर पांडेय की कविता ग्राम्य जीवन याद आयी;

    शान्ति पूर्ण लघु ग्राम बड़ा ही सुखमय होता है भाई

    देखो नगरों से भी बढ़कर इनकी शोभा अधिकाई

    कपट द्वेष छलहीन यहाँ के रहने वाले चतुर किसान

    दिवस बिताते हैं प्रफुलित चित, करते अतिथि द्विजों का मान ।

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  4. बढ़िया आलेख...जरुर लगाईयेगा एक नीबूं का पेड़,,,,

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  5. मुंह में पानी आया बीच की एक लाइन पढ़ते हुए...

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  6. गाँव का भूदृश्य सदैव ही लुभाता है । प्रविष्टि ने आपकी आत्मीयता को उजागर कर दिया ।

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  7. नीम्बू के पेड़ से कच्चे निम्बू तोड़ के खाना और उसका स्वाद ता उम्र नहीं भुलाया जा सकता है वाकई वह ज़िन्दगी अधिक मीठी थी गन्ने की स्वाद सी .सुन्दर संस्मरण ..

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  8. पंकज भाई, आज सभी जगह का यही हाल है। हर जगह पेड़ काटे जा रहे हैं। आपका नींबू का पेड़ लगाने का संकल्प बहुत शुभ है। इसे संजो कर रखिएगा।
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    सिर पर मंडराता अंतरिक्ष युद्ध का खतरा।
    परी कथाओं जैसा है इंटरनेट का यह सफर।

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  9. ये हर गाँव की गाथा है।
    @ गांव शहरों के बिगडे हुये छोटे भाई: सही है। संक्रमण काल है। देखिए क्या होता है। नई पीढ़ी का गाँवों से पलायन चिंतनीय है। शायद एक नए संतुलन बिन्दु पर थम जाए।
    नीबू क्या पूरा बागीचा ही लगाइए लेकिन उसे पानी देने और जिलाने के लिए एक स्थाई व्यवस्था की आवश्यकता होगी।
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  10. प्रवाह अतीत की गलियों से गुजरता हुआ पुरानी माटी की सौंधी खुशबु दे रहा है..बहुत अच्छी अभिव्यक्ति..

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  11. लेकिन, नीबू का पेड सोचते ही गांव याद आ गया. लेकिन गांव अब गांव कहाँ रहे. विकास के नाम पर उनका मनोहारी जीवन दायी रूप बिगड गया. आज गांव शहरों के बिगडे हुये छोटे भाई लगते हैं. कई सालों बाद अपने गांव गया तो मुझे लगा कि मैं कहाँ आ गया. सब कुछ बदला बदला सा. और ये बदलाव प्रगति वाला तो बिल्कुल नहीं था. पालायन की छाया स्पष्ट थी, हर कुछ घर के बाद घरों पर ताले जडे थे. कोई पहचाना चेहरा नजर नहीं आया जबकि पूर्व में कोई भी मिलता था तो पहचान ढूंढ ही लेता था.


    लेमन ट्री से लौटा तो सोचा इस बार गांव जाउंगा तो नीबू का एक पेड अवश्य लगाउंगा.

    बचपन की बातें और उनसे जुडी यादें कुछ ऐसी होतीं हैं वो भुलाये नहीं भूलतीं या हम उन्हें भुलाना चाहते ही नहीं ....और जब हम देखते हैं उन यादों को किसी ने छिनने की कोशिश की है तो कुछ ऐसे ही भाव पैदा होते हैं ......निम्बू लगा लेने भर से गाँव बचपन जैसा तो नहीं हो जायेगा ....हाँ उन यादों को सुकून जरुर दे जायेगा ......!!

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  12. आपने सच ही कहा अब वो गाँव कहाँ रहे |हमारी पीढ़ी अभी वही पुराने खेत खलिहान छायादार पेड़ के बीच अपना बचपन ढूंढते है ,कितु अब खेत खलिहान भी है पेड़ भी है पर वो अपनापन नहीं है |पिछले साल मै जब अपने
    गाँव गई और देखा कि जिस नदी से गावं कि शान थी वो नदी का पानी आगे बांध बना कर रोक दिया है और जहाँ घाट पर कभी कांच सा पानी था आज वहां ट्रकों से भरकर रेत गिट्टी शहर धडल्ले से ले जा रही है और कभी यहाँ बहती नदी थी कल्पना भी मुश्किल हो रही थी \

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  13. सच में अब गाँव कहा रहे ! सब कुछ ख़तम सा हो गया है! इसी अनुभव पर लिखा है -

    http://hiteshmathpal.blogspot.com/2009/11/waqt.html

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