शनिवार, 15 मई 2010

अब पढ़ाई भी फोरेन

नालंदा के खंड़हरों के सामने खड़ा हूँ और साथ चल रहा गाइड बता रहा है, ये दुनियां की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी है. दुनियां भर से ज्ञान की तलाश में दस हजार विद्यार्थी  को एक हजार गुरुजन धर्म से लेकर विज्ञान  तक पढाते थे. कितना अच्छा अनुपात है, दस पर एक. प्रवेश इतना कठिन कि पहला टेस्ट तो द्वार पाल ही जिन्हें द्वार पंडित कहते थे, ले लेते थे. गाइड बता रहे हैं कि इस तरह की कई यूनिवर्सिटी भारत में थी, जैसे तक्षशिला और विक्रमशिला.


कुछ दिन बाद दिल्ली से मेरठ जाते जाते फिर देखता हूँ, इंजीनियरिंग, मैनेजमैंट आदि के कॉलेज से लेकर यूनिवर्सिटी तक की लाइन लगी हुयी है. ये सब यूं तो शिक्षा के प्रसार के लिये हैं, लाभ इनका मकसद नहीं. लेकिन ये किसी से छुपा नहीं कि शिक्षा बड़ा व्यापार बन चुकी है, भले ही यहाँ लाभ को सरप्ल्स कहते हैं. लेकिन, पिजा बर्गर की तरह फ्रेंचाइजिंग के चक्कर में प्रीस्कूल से लेकर हायर एडूकेशन तक की दर्शनीयता हर गली नुक्कड़ तक बढ़ा दी है पर गुणवत्ता गायब हो गयी है. इनमें क्लास रूम तो हैं लेकिन फैकल्टी नदारद. नालंदा के स्वर्णिम काल से ये फ्रेंचाइजिंग इरा. क्या हुआ है हमारी शिक्षा को.


इस फैलाव के समर्थक कहते हैं कि तकनीकी रूप से शिक्षित लोगों की फौज तैयार हो रही है जो देश के लिये संपत्ति है. परंतु गुणवत्ता के आभाव में केवल एक बदलाव आया है, अब समस्या बेरोजगारी की जगह अंडर एम्प्ल्योमेंट की होती जा रही है जहाँ लोग अपनी शिक्षा  के हिसाब से नौकरी नहीं पाते. इंजीनियरिंग करने के बाद कॉल सेंटर पर ग्राहकों से बतियाते हैं और मैनेजमेंट ग्रेजुयेट इंश्योरेंस पॉलिसी बेचते हैं.


पिछले दिनों, एडूकेशन फिर से चर्चा में है, राइट टू एडूकेशन का बिल हो या फोरिन यूनिवर्सिटी की आमद की खबर. इस चर्चा से सबसे पहले तो ये स्वीकारोक्ति सामने आती है कि देश में आजादी के छ: दशक से अधिक समय बीतने पर भी शिक्षा न तो बच्चों को उपलब्ध है और न बड़ों को.


हमारे देश में फोरेन का बड़ा शौक है, चाहे सामान हो या पढ़ाई. आज हम ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज, स्टैनफोर्ड को भारत लाने की सोच रहे हैं पर हमारी अपनी ऑक्स्फोर्ड और कैंब्रिज ऑफ ईस्ट कही जाने वाली यूनिवर्सिटीज का क्या हुआ. आज वहाँ पढ़ाई जैसा कुछ नहीं बचा, पुरानी विक्टोरियन बिल्डिंग्स के सिवा. आजादी के बाद जोर शोर से शुरु किये अनेक इंस्टीट्यूसंस, चाहे वे एग्रीकल्चर से लेकर टेक्नीकल यूनिवर्सिटीज हों या वोकेशनल और
तकनीकी शिक्षा के सेंटरस जैसे आईटीआई और पॉलीटेक्निक्स, सब बदहाल हैं. फोरिन को फौरन लाने से ज्यादा जरूरत तो इस बात की लगती है कि हम अपनी देशी यूनिवर्सिटीज और ढेर सारे और इंस्टीट्यूसंस का स्तर सुधारें और उन्हें कंपटीटिव बनायें.
हाँ, ये ठीक है कि यदि फोरेन यूनिवर्सिटीज आयेंगी तो हमारे इंस्टीट्यूसंस को कंपटीसन मिलेगा. ये एक ऐसे कैटलिस्ट का काम कर सकते हैं जो हमारे अनगिनित इंस्टीट्यूसंस को अपना स्तर सुधारने को मजबूर करें. लेकिन कुछ सवाल भी हैं. विदेशों में यूनिवर्सिटीज का एक अहम योगदान अनेक विषयों, खासकर विज्ञान में रिसर्च होता है. और उनके बजट का बड़ा हिस्सा इस पर खर्च होता है. दुनियां भर के नये नये पेटेंट्स यूनिवर्सिटीज के नाम होते है. क्या ये यूनिवर्सिटीज जब भारत आयेंगी तो यहाँ भी क्या रिसर्च पर उतना ही ध्यान देंगी. क्या वहाँ की तरह यहाँ भी स्टूडेंटस फैलोशिप और स्कॉलरशिप देंगी. क्या विषयवस्तु में भारतीय तत्व होगा. एक दार्शिनिक ने कहा है, थैंक गॉड, मैं स्कूल नहीं गया, जाता तो मेरी मौलिकता खत्म हो जाती. तो क्या ये मेहमान हमारी मौलिकता बनाये रखेंगे क्योंकि शिक्षा केवल सूचना नहीं है, संसकृति और इतिहास भी है.


शिक्षा का भारतीय बाजार बेहद बड़ा है और किसी को भी लालची बना सकता है. आज भी अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड से लेकर रूस और चीन तक का शिक्षा व्यापार भारत के छात्रों पर निर्भर है. कहीं ऐसा न हो कि फोरेन एडूकेशन की आड़ में डिग्री बांटने वाले दौयम दर्जे के शिक्षा व्यापारी आ जायें और हमारे छात्र बस उनके फोरिन नाम की चंकाचैंध में खो जायेंगे. अक्सर देखा गया है कि विदेशों से कपड़ों से लेकर लैपटॉप तक के वे ब्रांड इंपोर्ट होते हैं जो उनके मूल देशों में सैचूरेट हो जाते हैं. कहीं ऐसा ही शिक्षा के साथ न हो. ऐसे में एक इमानदार रेगूलेटरी बोर्ड की सख्त जरूरत है जो इसे शिक्षा बबल बनने से रोके और देश की आने वाली पीढियों के भविष्य का ख्याल रख सके.

1 टिप्पणी:

  1. शिक्षा सच ही आज व्यापार बन गयी है ....आपका लेख बहुत सी जानकारी दे रहा है...आभार

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