शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

गरदन और छत के बीच की रस्सी


पिछले दिनो  कुछ ऐसा हुआ कि मुझे ये तस्वीर याद आयी. मैं अयोध्या में था और गलियों में घूमते घूमते एक युवती मिली अपने घर के द्वार पर. पिताजी ने कहा, बेटी कितनी भाग्यशाली हो, भगवान के सानिध्य में रहती हो. युवती ने कहा, हाँ, भाग्यशाली तो हूँ, तभी राक्षसों से बच के आ गयी. और पूछा तो पता चला दहेज की सताई थी, सुसराली जनों के अत्याचार से बचकर भागी.
फिर आयी खबर कि कैसे एक युवती को बीच समंदर दहेज की सुरसा ने निगल लिया. जबकि वो तो अपने पैरों पर खड़ी आधुनिक नारी थी. 

सोचते सोचते याद आयी लगभग पच्चीस साल पुरानी उपर की तस्वीर, तीन या चार बहिनों ने कानपुर में मौत को गले लगाया था क्योंकि उन्हें लगता था कि दहेज के कारण वे अपने पिता पर बोझ हैं. इस तस्वीर ने मुझे झकझोर दिया था और मैंने निर्णय लिया कि मैं ऐसी शादी में नहीं जाउंगा जहाँ दहेज लिया जाये. जानते हैं क्या हुआ उस निर्णय का परिणाम ! तबसे आज तक मैं चार छ: शादियों में ही जा पाया. एक अपनी, जिसमें मैंने प्रतीक के रूप में कुछ लेना अस्वीकार किया, दो बहिनों की जिनमें मैंने कन्या दान भी नहीं किया क्योंकि मैंने माना कि मेरी बहिनें वस्तु नहीं जिन्हें मैं दान में देदूं.  मैं बंधु बान्धवों मित्रों सबकी शादी से वंचित रहा. मेरा इतनी कम शादियों में जा पाना मेरी और समाज की हार है. कुछ नहीं बदल पाया 25 सालों में सिवा इसके कि अब दूसरी पीढ़ी की शादियां होने वाली हैं और मेरी पत्नी कहती हैं कि जब दूसरों की शादियों में नहीं जाओगे तो तुम्हारी बेटियों की शादियों में कौन आयेगा. मैं कहता हूँ, चाहता तो मैं भी हूँ कि जाऊँ और दुल्हे दुल्हन को आशीष दूं,  पर क्या करूं इन लड़कियों की गरदन और छत के बीच की रस्सी ने बांधे रखा है मुझे.  

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपके इस फ़ैसले से समाज मे बदलाव नहीं आ सकता .
    लड़ाई समस्या से दूर भाग कर नहीं लड़ी जा सकती .
    आप ने अपनी और बहनो की शादी जिस प्रकार की
    वह ही आप की तरफ से लड़ाई का ठीक तरीका था

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  2. kanyadaan nahi karne ka nirnay aapka sarahneey hai..
    sahi kaha aapne kanya koi vastu nahi jiska daan kiya jaaye..
    hridayvidaarak chitr hain..
    ohhh..!!

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  3. बहुत भावुक कर दिया आपकी पोस्ट ने ..
    आप जैसे लोग विकल्प हैं और कभी तो यह विकल्प
    मजबूत होगा ही ..

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  4. इतने रेडिकल ! बाप रे !!
    घटना तो हृदयविदारक थी। मुझे भी याद है। दहेज खत्म हो जाएगा। बस हमारी पीढ़ी तक ही है।

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  5. समाज में रह कर समाज की बुराई को दूर करें ......... हर शादी में जाएँ और अपनी बात करने का प्रयास करें ...... शायद कोई एक तो सुधार जाए ...........

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  6. aapke vichar sarahniye hai ,dahej pratha ke dawab me kitni masoom jindagiya bali chadhti hai ,ise rokna to chahte hai magar bebas rah jaate hai .bahut hi badhiya likh hai .

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  7. अंतिम पंक्ति ने हिला दिया ! मन डोल उठा । कितना घबरा जाता है मन यह सोचकर - "कुछ नहीं बदल पाया 25 सालों में " । आगे क्या होगा !
    आपके कदम ने शक्ति भरी है हममें भी !

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  8. सच ही है पंकज जी.. समय बदला है लोग भी बदले है , पर इसी के साथ कुरीतियों का स्वरुप भी बदला है. मैंने अपने आस पास कई तथाकथित कुलीनों को विकृत कुरीतियों से ग्रस्त देखा है. अंतिम पंक्तियों में मर्मस्पर्शी निचोड़ है.. ! इस रचना के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद .

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  9. Oh agar pahle pata hota to apni shaadi me aap ko zaroor bulata aur aap ate bhi. Koi baat nahi ab aap meri betiyon ki shaadi me ayiyega aur mai ap ki betiyon ki shaadi me aunga. zahir hai aap nirash nahi honge :)

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  10. tusi GREAAT ho sir..

    recently read on the internet - high school girl student commited suicide due to eve teasing ..in kanpur city.. heart bleeds..

    still have hope just because of people like you.. go hard..

    If you come here, promise, drinks on me!!!

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