मंगलवार, 25 अगस्त 2009

कृष्ण की चिरप्रेयसी

पिछले दिनों मिली मुझे कृष्ण की चिरप्रेयसी, यमुना और कहने लगी अपनी करुण कथा :
अगर हाथ होते मेरे तो
कहती हाथ जोड़कर
कर दो मुझे क्षमा
कि मैंने तुम से दोस्ती की.
लिख पाती अगर पत्र तो
लिखती एक
नदी हित याचिका.
पूछ्ती उठा कर सर
ताज के वातावरण में
कार्बन जांचने वाले यंत्र से
कभी झुको और लो एक
अंजुरी जल मेरा
देखो, कुछ आक्सीजन शेष है क्या.

जिस जल से प्यास बुझाई
इन सबकी युगों तक
सींचा इनके खेतों और वनों को
और धो दिये पाप
शरीर के साथ साथ
आज भर दिया उसीको
जहर से और देखा भी नहीं मुड़कर


देखी हैं तुमने
ये सीडियां
पता नहीं
उतरती हैं नदी में
या उगती हैं यहाँ से
रोकती हैं मुझे
शहर में घूमने से
पर रोक पाती नहीं
शहर को मुझसे खेलने से

देखा है मैंने
मिटते अपनी सहोदरा सरस्वती को
मैंने अपनी सखियों को भी
देखा है अपनी राह ना आते अब
पर्वत कन्यायें ये
विमुख हुयी हैं मुझसे कुछ्
और कई तो व्यतीत हुई बन उष्मा
उनके स्थानों पर आती हैं
मुझसे मिलने अब
दूषिता कन्यायें नगर की
मेरे श्यामल तन को
भरती अपनी कालिख से
मेरे जल को जहर बनाती
अपने मारक विष से

ऋग वेद की ऋचाओं से
गीत गोविन्द के पदों तक
मैं उतरी हूँ हिमालय से
तुम्हारे मानस पर
कभी देवी
कभी उर्वरा और अन्नपूर्णा
कभी प्रेयसी बनकर
मैं सूर्य सुता
यम की भगिनी
मैंने पोसा है
मानव सभ्यताओं को
वनों को और
पशुओं के समाज को भी

देखा मैंने आर्यों को
युनानियों को
हूणों को और यवनों को
मुझ पर मोहित होते

बड़े बड़े बेड़ों को
अपनी लहरों पर
पार कराया महादेश

करुण कथा सुन एक दिन
एक यायावर ने पूछा
अर्पित करते हुये पुष्प
और गाते हुये प्रार्थना
मुझसे चिरन्तर
बहते रहने की
मैं क्या कर सकता हूँ माते !
तुम्हारा खेद मिटाने के लिये
मैं तो निरीह हूँ
अकेला हूँ अकिंचन हूँ

मैं तो स्वयम् भुक्त भोगी हूँ
मैंने ओक भर प्यास
बुझानी चाही
तो डस गया जहर
जल में छुपा
खुले गगन में
साँस लेने की कामना की मैंने
तो घुस गयी हृदय में
रेडियोधर्मी हवा
मैं तो हूँ साधनहीन
जब राज्य नहीं कुछ कर पाया
मैं क्या कर पाऊंगा मां!

मैंने कहा
वत्स ! कुछ तो
कर ही सकते हो
चलो ये पुष्प ही
अर्पित मत करो
और हाँ वह कुरूप थैली भी
जिसमें लाये हो तुम ये पुष्प
ये रोक देते हैं मेरी स्वांस
जानते हो तुम
यदि कहते हो तुम मुझे विष्णु
क्योंकि मैं सींचती तुम्हारे खेत
तो वृक्ष शिव हैं
पीते हैं विष जैसे उन्होंने पिया था

एक वृक्ष मेरे नाम से लगा दो
जब पुष्पित होगा वह
और गिरेंगे धरा पर पुष्प गुच्छ
वो ही मेरे लिये पुष्पार्पण होगा

मैं कृष्ण की चिरप्रेयसी
उन्हीं की तरह अजर अमर
रुक्मिनी सत्यभामा
यहाँ तक कि राधा की ईर्ष्या की पात्र
आज सोचती हूँ
क्या रह पाउंगी अमर
या हो जाउंगी विलोप.

10 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बच पायेगी यमुना?

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  2. अभिव्यक्ति का प्रभावी उदाहरण । खूबसूरत दृष्टि ।

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. क्या बचेगी यमुना......मार तो डाला सबने मिलकर...
    सांवरी सी यमुना अब काली हो गयी है.
    बहती थी जो इठला कर अब नाली हो गयी है
    शेष रहा क्या पास उसके कंगाली हो गयी है
    गौरव गरिमा सब ख्वाब हुए बदहाली हो गयी है

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  5. अभिव्यक्ति और ज्ञान का अद्भुत समन्वय ....
    आपकी यह कृति नमन की पात्रा है...
    पता नही क्यूँ मुझे तीन बार कमेन्ट करना पड़ा !!

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  6. बहुत सुंदर रचना...
    कहीं कहीं प्रेयसी के स्थान पर प्रेयषी लिखा गया है। कृपया ठीक कर लें।
    शुभकामनाएं

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  7. आधुनिक वैज्ञानिक युग की यह त्रासदी आपकी कलम से निकलकर इन शब्दों के माध्यम से हमारे में एक बेचैनी भरने में सफल हुई।

    लेकिन अफ़सोस यह है कि हम इसके आगे कुछ नहीं कर पाते। कितने तो कारक हैं जिन्हें मिटा पाना लगभग असम्भव होता जा रहा है।

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  8. आपकी कविता बहुत ही मार्मिक लगी. आपसे अपेक्षा रहेगी कि आप ऐसी ही सार्थक रचनायें से सबको आलोडित करते रहेंगे.

    शुभकामनाएं.

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  9. आपने तो गागर में सागर नहीं महासागर भर दिया. चंद पंक्तियों में पूरे पर्यावरण की गंभीर दशा को इससे बेहतर नहीं व्यक्त किया जा सकता. आप जैसे लोगों से उम्मीद जगती है कि शायद मनुष्य को सदबुद्धि आए बरना ना नदियां बचेंगी ना खेत खलिहान और बगीचे, रह जाएंगे रेगिस्तान और संगमरमर के कब्रिस्तान

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