लखनऊ 19 सितम्बर 09
ईद मुबारक.
इसे मैं उत्तर प्रदेश के समाज का ताना बाना मानूं या एक संयोग कि मेरा पूरा बचपन और किशोरावस्था ऐसे स्थानों पर बीती जो मुस्लिम संस्कृति से ओत प्रोत थे.
आँवला, बरेली जिले की एक तहसील है, एक छोटा सा कस्बा. मेरा बचपन यहाँ बीता. यहाँ मुस्लिम आबादी तो खूब थी ही साथ में मुस्लिम संस्कृति का पूरा असर शहर पर था. शायद पूर्व में रूहेला हुकुमत का एक प्रमुख केन्द्र होने के कारण. यहाँ मुस्लिम बस्तियाँ अलग तो थी पर अलग नहीं थी. हमारे घर के पीछे मुस्लिम बस्ती थी और सामने मस्जिद. फज्र की अज़ान से ही हमारी नींद खुलती थी.
अलग अलग संस्कृतियों का मिलन ऐसा था कि ईद की खुशी से हम बच नहीं सकते थे और दीपावली की रोशनी उनके घरों को रोशन करके ही मानती थी. इस मेल से कभी कभी उलझन भी खडी हो जाती थी. एक बार मोहर्र्म और होली आसपास थे. मोहर्र्म का जुलूस हमारे घर के नीचे से निकल रहा था और उस त्योहार की संजीदगी से बेखबर मैंने अपनी पिचकारी का मुँह खोल दिया. एक बुजुर्ग के कपडे खराब हुये तो उन्होंने तीखी नजरों से मुझे देखा, चिल्लाया और मेरा डर से बुरा हाल. इतने में लाला रामप्रताप जी जिनकी मस्जिद के पास दुकान थी, बोले, हाजी साहब! गम में गुस्सा ! थूक दो. हाजी साहब मुस्कराये और आगे बढ गये. उस दिन मुझे मोहर्र्म और गम का रिश्ता समझ आया.
लेकिन आज गम की नहीं हम ईद की बात करने बैठे हैं. ईद का अर्थ ही होता है खुशी. और ईद पर आँवला की हवा में भी खुशी होती थी.
आँवला में मेरे कई दोस्त थे इनमें एक था रफीक. उसका धर्म या गरीबी कभी हमारी दोस्ती के बीच नहीं आयी. सच तो यह है कि हमारे मन तब तक सामाजिक विभाजन की ये धार्मिक या आर्थिक दरारें थी ही नहीं. रफीक के पिता सलीम साहब तांगा चलाते थे. बहुत बाद में वे अचानक रिक्शा चलाने लगे. रफीक से पूछा तो पता चला कि उन्हें अपने बच्चों को पालने के लिये घोडे पर जुल्म अच्छा नहीं लगा और खुद रिक्शा चलाना बेहतर लगा. कितने खूबसूरत विचार!
ईद आती थी तो हम भी ईदगाह जाते थे, भले ही हमारा उद्देश्य नमाज नहीं मेला होता था. सबसे गले मिलते और फिर दोस्तों के घर सैंवई की दावत उडाते. एक मजेदार बात और, पिताजी अपने मुस्लिम मिलने जुलने वालों से कहा करते थे कि ये ईद हमारी है और बकरीद आपकी. उनका अर्थ था कि हम ठहरे शुद्ध शाकाहारी, बकरीद के मांस से बने पकवान हमारे किस काम के. हमारी ईद तो ईद उल फित्र है जब सैंवई बनें. इसे हम बहुत दिनों तो शाब्दिक अर्थ में लेकर ईद उल फित्र को अपना त्योहार मानते रहे.
आर्थिक तंगी इस तरह थी कि शाम को जब सलीम साहब घर लौटते तो रफीक रघ्घन की दुकान से एक दिन के लिये आटा, तेल और मसाले ले जाता. लेकिन ईद पर उसका परिवार भी फित्र ( दान ) में अनाज देता. ईद खुशी है और जब तक सब एक-दूसरे की खुशी में शरीक न हों तब तक ईद कहाँ. पृथ्वी पर गरीबों की कमी नहीं, जो अपने को गरीब समझते हैं उनसे भी गरीब कोई है. तो उनको दान दिया जाए तकि वे भी ईद की खुशियाँ मनायें.
हाईस्कूल के बाद हम अलीगढ आ गये और फिर रफीक नहीं मिला. न जिस्मानी न रूहानी. अलीगढ की हवाओं में भी ईद की खुश्बू बहती थी और दीपावली का प्रकाश भी, यहाँ भी मेरे मुस्लिम दोस्त बने और ईद की सैंवइयां भी खूब खाईं पर एक विभाजन था एक दरार थी. अलीगढ दंगों के लिये कुख्यात था. दंगा हर साल एक रिवाज की तरह लौटता था, ये अलग बात है कि ये तय नहीं था कि किस बात पे दंगा होगा. अलीगढ ने मुझे एक अलग इस्लाम से भी मिलाया. बहुत बाद में जाना कि जहाँ संभवत: मेरे बचपन के आँवला का इस्लाम बरेली का हिस्सा होने के नाते इस्लाम की नरम बरेलवी विचार धारा में डूबा था, अलीगढ दुनियाँ भर की इस्लामी विचार धाराओं का गढ था और दुविधा में था.
इन दिनों लखनऊ में हूँ. मेरी ही तरह मेरी पत्नी की भी सबसे अच्छी दोस्त मुस्लिम है. अपनी वाली ईद पर हम उनके घर जाते हैं तरह तरह की सैंवईं खाते हैं और खुशी मनाते हैं. जब उनके और मेरे बच्चे उनसे और हमसे ईदी माँगते हैं तो मुझे लगता है मेरा बचपन लौट आया है.
ईद मुबारक.
thinking of my father ऐसे ही
5 वर्ष पहले


