मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

अलविदा मुंशीजी

मुंशीजी, उनका असली नाम मुझे कभी नहीं पता चला या मैंने जाना ही नहीं. वो हमारे मुगलसराय ल्यूब डिपो के हैंडलिंग ठेकेदार थे. सच कहें तो, मुंशीजी एक इंस्टीट्यूशन है. हमारे हर डिपो में जो हैंडलिंग ठेकेदार हैं, सब के सब मुंशी जी ही हैं. पीढी दर पीढी हमारे वफादार सहायक. डिपो की हर गतिविधि में पूरे मन से लगे रहने वाले. उनसे मेरा पहला सामना हुआ, इलाहाबाद के ल्यूब डिपो में. मैं, जिस इंवेटरी को पूरी कोशिश के बाद भी गिन पाने में असमर्थ था, उन्होंने फुर्ती से उसे गिना और हिसाब मिला दिया. बिल्कुल निरक्षर होते हुये भी.




खैर, आज तो मैं मुगलसराय के मुंशी जी की बात कर रहा हूँ. जब मुगलसराय में रीजनल ऑफिस बना तो डिपो के साथ ही वे ऑफिस के भी केयर टेकर बन गये. कोई भी काम बोलिये, हमेशा तैयार. और खास बात ये कि उनके कार्य व्यवहार से कभी ऐसा नहीं लगता था कि वे प्रोफिट के लिये काम करते हैं.


हम वाराणसी में रहते थे और मुगलसराय था चौबीस किलोमीटर दूर. सुबह खाना ले जाना या दोपहर में मंगाना जरा कठिन था. योजना बनी कि क्यों न वहीं खाना बनाया जाये. लेकिन समस्या थी कौन व्यवस्था करेगा, कुक कहाँ मिलेगा. मुंशी जी को बुलाकर पूछा गया तो उनका चिर परिचित उत्तर आया, “कौन मुश्किल है, हुयी जायी”. दूसरे ही दिन से खाना बनना शुरू. मुंशीजी खुद कुक बने और हर दिन नयी नयी चीजें बना कर खिलाने लगे. उनकी हरे धनिये की चटनी, जिसमें वे सरसों के तेल की बूंद डालते थे, का फ्लेवर आज तक याद आता है.




डिपो में मुंशी की जान बसती थी, और खुद मुंशी जी भी. पास ही उनका घर परिवार था पर वे बचपन से ही डिपो में ही रहते आये थे और उनका मन कहीं और नहीं लगता था. तीन साल पहले, हमारा नया डिपो बना और ल्यूब भी वहीं शिफ्ट हो गया. ठेकेदार मुंशी जी ही रहे, लेकिन उनका रहना पुराने डिपो में ही रहा. पिछले साल जब मुगलसराय गया तो अपना पुराना ऑफिस देखने जा पहुँचा. देखा, हमेशा की तरह मुंशी जी सफेद कुर्ते पजामे में साइकिल पर सवार आ रहे हैं. देखकर उतरे और बोले, “नमस्कार साब! ठीक हैं”? उनसे मिलकर उनके हाथ के खाने की खुश्बू ताजा हो गयी.




फिर कंपनी ने सोचा, बंद डिपो का किराया क्यों दें. कंपनी कोई मुंशी जी तो है नहीं, वो तो प्रोफिट के लिये काम करती है. डिपो को खाली कर मालिक को वापस करने की योजना बनी और अनुमोदन आते ही तैयारी शुरू हो गयी. वहाँ बने टिन शेडस तोड़े जाने लगे. उस दिन मुंशीजी की आँखों में सूनापन था, कहने लगे, ये सब अपने हाथ से बनाया था, अब टूट रहा है. साफ सफाई के बाद निश्चित हुआ कि जमीन के मालिक केडिया जी को बुलाया जाये. शाम को केडिया साहब आये और मुआइना करने लगे. उन्होंने देखा कि मुंशी का सामान अभी भी एक कमरे में रखा है. सामान माने कुछ कपड़े खूंटी पर और एक छोटा सा बक्सा. यही उनकी संपत्ति थी. सच में वो एक फकीर जैसे थे. केडिया जी बोले, “मुंशी जी को कहिये कि सामान हटायें और जगह खाली कर दें, हम पजेशन तभी लेंगे”. अधिकारियों ने मुंशीजी की ओर देखा और उन्हें संदेश मिल गया, हमेशा की तरह बोले, “कौन मुश्किल है, हुयी जायी”.


अगले दिन सुबह का समय तय हुआ. सभी लोग डिपो पहुँचे तो देखा मुंशीजी ने कमरा खाली नहीं किया है. सभी को आश्चर्य हुआ क्योंकि ऐसा कभी हुआ नहीं कि मुंशीजी कोई काम बोलें और न करें. किसी ने आवाज दी, “मुंशीजी...”. पर जब कोई उत्तर नहीं मिला तो उनके कमरे में जाकर देखा तो पाया मुंशीजी के शरीर ने न सही पर आत्मा ने कमरा खाली कर दिया था.

3 टिप्‍पणियां:

  1. यह कहानी नहीं, सच है। मुंशी जी का 'हुयी जायी' अभी भी याद है। कोई काम ऐसा नहीं रहा जो 'हुयी जायी' के बाद होने से रह गया हो। तापस कर्मयोगी थे वह। उस अनपढ़ आदमी के काम का 'परफेक्शन' अभी भी याद आता है। ...मेरे उत्तेजित होने पर उनकी वह 'वत्सल दृष्टि!' - 'एसे का होई?'
    कहते हैं कि जमाना 'आदमी' की कदर नहीं करता। मुझे लगता है कि ऐसे लोगों से ही आदमियत कायम है और आदमी की कद्र भी है।
    मुंशी जी को श्रद्धांजलि।

    'मेरी कब्र पर छींट देना चन्द चमेली के फूल
    सादी लेकिन खुशबूदार रही जिन्दगानी मेरी।'

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