अहमदाबाद, 06 जून 2010
अहमदाबाद में हूँ. यूँ तो यहाँ आई आई एम में ट्रैनिंग के लिये आया हूँ, पर अहमदाबाद में इससे भी बड़ा ट्रैनिंग इंस्टीट्यूट मुझे साबरमती आश्रम लगता है. गांधी ने यहीं से सत्य का आग्रह किया और देश को स्वतंत्रता और स्वाबलंबन का मंत्र दिया. खादी से लेकर दांडी यात्रा तक के आंदोलन यहीं जन्मे. यहीं से गांधीजी ने व्यापार का एक नया मॉडल दिया, ट्रस्टीशिप का मॉडल. इस मॉडल के अनुसार किसी भी व्यापार की संपदा किसी पूंजीपति की नहीं है, वह केवल उसका ट्रस्टी है जो इस संपदा के असली मालिक यानी समाज की ओर से उसकी देखभाल करता है.
आश्रम साबरमती नदी के तट पर है और देश की हर नदी की तरह इसका हाल भी बेहाल है. देखता हूँ, आश्रम में बहुत लोग आते हैं पर अधिकतर पिकनिक की तरह. उबाऊ चित्र प्रदर्शनी है और बिल्लों और पेनों के स्मारकों की दुकान भी है पर गांधी को ढूंढता हूँ , कहीं बकरी को घास खिलाते, सूत कातते या पेड़ के नीचे वैष्णव जन तो तैने रे कहिये गवाते मिल जायें तो वे नहीं मिलते.
नालंदा के खंड़हरों के सामने खड़ा हूँ और साथ चल रहा गाइड बता रहा है, ये दुनियां की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी है. दुनियां भर से ज्ञान की तलाश में दस हजार विद्यार्थी को एक हजार गुरुजन धर्म से लेकर विज्ञान तक पढाते थे. कितना अच्छा अनुपात है, दस पर एक. प्रवेश इतना कठिन कि पहला टेस्ट तो द्वार पाल ही जिन्हें द्वार पंडित कहते थे, ले लेते थे. गाइड बता रहे हैं कि इस तरह की कई यूनिवर्सिटी भारत में थी, जैसे तक्षशिला और विक्रमशिला.
कुछ दिन बाद दिल्ली से मेरठ जाते जाते फिर देखता हूँ, इंजीनियरिंग, मैनेजमैंट आदि के कॉलेज से लेकर यूनिवर्सिटी तक की लाइन लगी हुयी है. ये सब यूं तो शिक्षा के प्रसार के लिये हैं, लाभ इनका मकसद नहीं. लेकिन ये किसी से छुपा नहीं कि शिक्षा बड़ा व्यापार बन चुकी है, भले ही यहाँ लाभ को सरप्ल्स कहते हैं. लेकिन, पिजा बर्गर की तरह फ्रेंचाइजिंग के चक्कर में प्रीस्कूल से लेकर हायर एडूकेशन तक की दर्शनीयता हर गली नुक्कड़ तक बढ़ा दी है पर गुणवत्ता गायब हो गयी है. इनमें क्लास रूम तो हैं लेकिन फैकल्टी नदारद. नालंदा के स्वर्णिम काल से ये फ्रेंचाइजिंग इरा. क्या हुआ है हमारी शिक्षा को.
इस फैलाव के समर्थक कहते हैं कि तकनीकी रूप से शिक्षित लोगों की फौज तैयार हो रही है जो देश के लिये संपत्ति है. परंतु गुणवत्ता के आभाव में केवल एक बदलाव आया है, अब समस्या बेरोजगारी की जगह अंडर एम्प्ल्योमेंट की होती जा रही है जहाँ लोग अपनी शिक्षा के हिसाब से नौकरी नहीं पाते. इंजीनियरिंग करने के बाद कॉल सेंटर पर ग्राहकों से बतियाते हैं और मैनेजमेंट ग्रेजुयेट इंश्योरेंस पॉलिसी बेचते हैं.
पिछले दिनों, एडूकेशन फिर से चर्चा में है, राइट टू एडूकेशन का बिल हो या फोरिन यूनिवर्सिटी की आमद की खबर. इस चर्चा से सबसे पहले तो ये स्वीकारोक्ति सामने आती है कि देश में आजादी के छ: दशक से अधिक समय बीतने पर भी शिक्षा न तो बच्चों को उपलब्ध है और न बड़ों को.
हमारे देश में फोरेन का बड़ा शौक है, चाहे सामान हो या पढ़ाई. आज हम ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज, स्टैनफोर्ड को भारत लाने की सोच रहे हैं पर हमारी अपनी ऑक्स्फोर्ड और कैंब्रिज ऑफ ईस्ट कही जाने वाली यूनिवर्सिटीज का क्या हुआ. आज वहाँ पढ़ाई जैसा कुछ नहीं बचा, पुरानी विक्टोरियन बिल्डिंग्स के सिवा. आजादी के बाद जोर शोर से शुरु किये अनेक इंस्टीट्यूसंस, चाहे वे एग्रीकल्चर से लेकर टेक्नीकल यूनिवर्सिटीज हों या वोकेशनल और
तकनीकी शिक्षा के सेंटरस जैसे आईटीआई और पॉलीटेक्निक्स, सब बदहाल हैं. फोरिन को फौरन लाने से ज्यादा जरूरत तो इस बात की लगती है कि हम अपनी देशी यूनिवर्सिटीज और ढेर सारे और इंस्टीट्यूसंस का स्तर सुधारें और उन्हें कंपटीटिव बनायें.
हाँ, ये ठीक है कि यदि फोरेन यूनिवर्सिटीज आयेंगी तो हमारे इंस्टीट्यूसंस को कंपटीसन मिलेगा. ये एक ऐसे कैटलिस्ट का काम कर सकते हैं जो हमारे अनगिनित इंस्टीट्यूसंस को अपना स्तर सुधारने को मजबूर करें. लेकिन कुछ सवाल भी हैं. विदेशों में यूनिवर्सिटीज का एक अहम योगदान अनेक विषयों, खासकर विज्ञान में रिसर्च होता है. और उनके बजट का बड़ा हिस्सा इस पर खर्च होता है. दुनियां भर के नये नये पेटेंट्स यूनिवर्सिटीज के नाम होते है. क्या ये यूनिवर्सिटीज जब भारत आयेंगी तो यहाँ भी क्या रिसर्च पर उतना ही ध्यान देंगी. क्या वहाँ की तरह यहाँ भी स्टूडेंटस फैलोशिप और स्कॉलरशिप देंगी. क्या विषयवस्तु में भारतीय तत्व होगा. एक दार्शिनिक ने कहा है, थैंक गॉड, मैं स्कूल नहीं गया, जाता तो मेरी मौलिकता खत्म हो जाती. तो क्या ये मेहमान हमारी मौलिकता बनाये रखेंगे क्योंकि शिक्षा केवल सूचना नहीं है, संसकृति और इतिहास भी है.
शिक्षा का भारतीय बाजार बेहद बड़ा है और किसी को भी लालची बना सकता है. आज भी अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड से लेकर रूस और चीन तक का शिक्षा व्यापार भारत के छात्रों पर निर्भर है. कहीं ऐसा न हो कि फोरेन एडूकेशन की आड़ में डिग्री बांटने वाले दौयम दर्जे के शिक्षा व्यापारी आ जायें और हमारे छात्र बस उनके फोरिन नाम की चंकाचैंध में खो जायेंगे. अक्सर देखा गया है कि विदेशों से कपड़ों से लेकर लैपटॉप तक के वे ब्रांड इंपोर्ट होते हैं जो उनके मूल देशों में सैचूरेट हो जाते हैं. कहीं ऐसा ही शिक्षा के साथ न हो. ऐसे में एक इमानदार रेगूलेटरी बोर्ड की सख्त जरूरत है जो इसे शिक्षा बबल बनने से रोके और देश की आने वाली पीढियों के भविष्य का ख्याल रख सके.
आम का एक बाग देखा तो रुक गया. याद आयी बचपन की वे गरमियां जो ऐसे ही बागों में गुजारीं थी, कच्चे पक्के आम खाते, कच्चा दूध पीते और पास बहती नहर में नहाते. तरह तरह कर्कश हॉर्न मुझे टाइम मशीन से वापस वर्तमान में ले आते हैं. फ्लैश बैक को केवल हॉर्न नहीं छेड़ते, माबाइल की घंटी भी बजती रहती है. इतनी कि पता ही नहीं चलता कि फोन मेरा है कि किसी और का. उसकी सर्वव्याप्तता आम के बाग में भी दिखती है. आम के फलों से लदे मनोहारी पेड़ से एक मोबाइल टावर छेड़ छाड़ कर रहा है.
आम अभी छोटे छोटे हैं, पकने में कुछ हफ्ते लग जायेंगे. यात्रा आगे जारी रखता हूँ.
मेरठ, 04.04.2010
यात्रा पर हूँ. आम पर खूब बौर दिख रहा है. इतना कि आम की शानदार फसल की उम्मीद से मुंह में पानी आ रहा है. अमराई से कोयल की कुह कुह सुनाई दे रही है. ये मौसम मुझे बड़ा अच्छा लगता है, थोड़ा सूनापन लिये पर आशा से भरपूर.
लेकिन, गर्मी की आहट तेजी से सुनायी दे रही है. समय से तेज और असर से भी. गेहूं पक गया है और खेतों में जैसे सोना बिखरा है. कहीं कहीं कटाई शुरु हो गयी है. पसीने में लथपथ किसान लगे हैं.
दूर सौंफ भी पक रही है और एक पलाश का पेड़ अकेला खड़ा है. कभी पूरे के पूरे जंगल थे पलाश के इस क्षेत्र में, कितना मनोरम लगता था परिदृश्य.
23 मार्च 2010
आज भगत सिंह का शहीदी दिवस है. आज उन्हें सुखदेव व राजगुरु के साथ फांसी दे दी गयी थी. उन पर लिखी यह पोस्ट संभव शर्मा की http://esambhav.blogspot.com/ पोस्ट Crop of Revolution का एक अनुवाद है.
किसी भी फिल्म स्टार का जन्मदिन होता है तो सब टीवी चैनल सुबह से उन्हें हैप्पी बर्थडे की रट लगा देते हैं, पर हमारी आजादी के लिये अपनी जान दे देने वाले महानायक किसी को याद भी नहीं आते.
मैं भगत सिंह के खटखरकलां,(जिला नवांशहर, पंजाब) के पैत्रिक घर के सामने खडी सोच रही थी कि किसी में इतना जुनून कैसे हो सकता है कि वह अपने देश की आजादी के लिये अपनी जान ही दे दे. हमारी पीढ़ी जिसने आजाद भारत में जन्म लिया, के लिये ये समझना बहुत मुश्किल है. भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को हुआ और बाद में वे शहीद ऐ आजम के नाम से जाने गये. वे भारत के सबसे असरदार स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे.
जिस उम्र में हम निरुद्देश्य घूमते हैं उस उम्र में उन्होंने फांसी के फंदे को चूम लिया. 23 मार्च 1931 को फांसी के समय वे केवल 24 साल के थे. उस समय वह गाँधी जी से भी ज्यादा लोकप्रिय थे और अपने समय के यूथ आइकोन थे. आज के फिल्म स्टारस से कहीं बडे. उन दिनों के युवा उन जैसे बनना चाहते थे.
उस बच्चे के बारे में सोचिये जिसने बंदूक बोई ताकि बंदूकों की फसल उगे. माना ये उसकी कल्पना थी पर उसने अपने जैसे विचारों वाले युवा जो देश के लिये जान ले सकते थे और दे भी सकते थे, के साथ क्रांति की फसल उगाई. 1919 में जलियांवाला हत्याकांड ने 12 साल के भगत सिंह को झकझोर दिया और उस दिन उसे अपने जीवन का उद्देश्य मिल गया. उन्होंने चंद्रशेखर आजाद जैसे नायकों के साथ मिल कर अपना जीवन देश को दे दिया और हम माता पिता की रोक टोक पर ही कह उठते हैं, ये मेरी लाइफ है !
भगत सिंह से हमारी पीढ़ी जो सीख सकती है उसमें सबसे खास बात यह है कि उन्होंने कुछ भी उत्तेजना में नहीं किया. उनके सब काम चाहे वह सांडरस की हत्या हो या एसैम्बली में बंब फेंकना, एक सोची समझी योजना का हिस्सा थे. वे एसैम्बली में बंब फेंक कर भाग सकते थे पर उन्होंने गिरफ्तार होना पसंद किया. उनका उद्देश्य था, कोर्ट की कार्यवाही को अपने विचार देश के युवाओं में फैलाने के माध्यम के रूप में प्रयोग करना.
और वे इसमें सफल रहे, अपने जीवन में भी और उससे ज्यादा अपनी मौत में भी. वे आज भी प्रासंगिक हैं, जब हमें उन जैसे निस्वार्थ नेता चाहिये. वे एक आदर्श थे तब के युवाओं के लिये भी और आज के भी.
इस तीर्थ यात्रा जैसे सफर से घर लौटते हुये मुझे ये देखकर खुशी हुयी कि जहाँ तक कार के पीछे स्टिकर लगाने की बात है, पंजाब में आज भी भगत सिंह बहुत लोकप्रिय हैं. पर क्या स्टिकर के बाहर भी भगत सिंह हैं.
क्या केवल रंग दे बसंती जैसी फिल्मों का युवा ही उनका आज का संसकरण है. नहीं! भाई. हम जहाँ हों हम अपने लिये जगह बना सकते हैं. उनके विचार पढिये तो लगता है कि पिछ्ली शताब्दी के शुरू में भी वे कितने प्रोग्रेसिव थे. आजादी केवल रोड पर बेरोक टोक घूमना तो है नहीं. भारत सचमुच, “सारे जहाँ से अच्छा” हो सके उसके लिये हमें एक और आजादी की लडाई शुरु कर ही देनी चाहिये. आजादी अशिक्षा से, जाति और धर्म की दीवारों से, भूख से और स्वास्थ से.
यदि भगत सिंह ये कर सकते थे तो हम भी कर सकते हैं वो भी तो हम जैसे ही थे.