एक छोटा लड़का था. उसकी चाह थी, साइकिल चलाने की. वह एक दिन उठा, साइकिल उठाई और पेड़लिंग चालू. लेकिन कुछ ही दिन में वह हिम्मत हार गया. वह लोगों से टकराता था, सड़क पर गिरता था और बार बार अपने चोट लगाता था.
उसने सोचा, नहीं ये मेरे बस की बात नहीं. निराश, वो उस रात सो नहीं सका. वह सोचता रहा कि कैसे वह साइकिल चलाना सीखे. तभी उसके मन में एक विचार आया. सड़क के अंत में एक फुटबॉल मैदान है, वह वहाँ जाकर साइकिल सीख सकता है. वहाँ टकराने के लिये लोग नहीं होंगे. अगली सुबह,उसने यह मुहिम शुरू की और मैदान के चक्कर लगाने लगा. अब वह खुश था, कुछ दिनों के बाद, उसे लगने लगा कि वह अब सड़क पर जा सकता है. खुशी से भरा हुआ, वह अपनी साइकिल लेकर सड़क पर जा पहुँचा. लेकिन अफसोस! वह सड़कपर जाते ही एक साइकिल से टकराया और गिर गया. चोट इतनी कि वह अस्पताल ले जाया गया. जब लड़के को होश आया तो उसने अपने पिता को अपने पास पाया, लड़का दु:खी था, बोला, "पापा, मैं साइकिल चलाना नहीं सीख सकता”. पिता ने कहा, "बच्चे ! अभी तुम आराम करो." दो एक दिन में लड़का घर लौट आया. उसके दिमाग में पक्का यकीन था कि साइकिल उसके लिए संभव नहीं है. वह बोला,” पापा, सड़क कितनी पतली हैं और खराब. और लोग इतने जो किसी की चिंता नहीं करते. वे मेरे रास्ते में आ जाते हैं और टकराते हैं. मैं फुटबॉल के मैदान में कितना तेज चलता हूँ. लेकिन जब मैं सड़क पर आता हूँ तो सब कुछ गड़बड़ हो जाता है." लड़का बिल्कुल रुआंसा था.
अगले दिन, उसके पिता उसे शहर में चल रहे सर्कस में ले गये. लड़का बहुत खुश था. उसे जोकरों के चेहरे और नाचते भालुओं को देखकर मज़ा आया. यहाँ एक रस्सी कई फुट उंचे दो खम्भों पर बंधी थी. एक लड़का आराम से रस्सी पर चल रहा था. फिर एक और लड़का आया जो रस्सी पर साइकिल चलाने लगा. छोटा लड़का हैरान था. अब, उसके पिता ने उस से पूछा, "मेरे बेटे ! बताओ, सड़क पर साइकिल के लिये तुम्हें कितनी जगह चाहिये ?" लड़के ने थोड़ी देर सोचा और कहा, "बस रस्सी जितनी" पिता ने कहा, "बेटा! हमें साइकिल चलाने के लिये केवल थोडी सी जगह चाहिये. जब कुछ लोग बिना किसी समस्या के रस्सी पर साइकिल चला सकते हैं तो हम कैसे चौडी सड़कों पर भी टकराते हैं और गिर जाते हैं. बेटा ! यह इसलिए कि हमारे मन की सड़क रस्सी से भी अधिक संकरी है. हम अपने लिए अनजानी सीमाएं और आधार हीन डर बना लेते हैं. इसके अलावा, हम अपनी सीमायें दूसरों पर डाल देते हैं. तो, बेटा ! जाओ, सोचो कि तुम एक रस्सी पर चलने वाले नट हो.
अगली सुबह वह बच्चा निर्भय सड़क पर तेजी से साइकिल चलाने लगा. सीमाओं, भय और पूर्वाग्रहों से अपने मन को मुक्त कर दो और तुमको सब कुछ मिल जाएगा.






